नव गीत :
संजीव 'सलिल'
ओढ़ कुहासे की चादर,
धरती लगाती दादी.
ऊँघ रहा सतपुडा,
लपेटे मटमैली खादी...
सूर्य अँगारों की सिगडी है,
ठण्ड भगा ले भैया.
श्वास-आस संग उछल-कूदकर
नाचो ता-ता थैया.
तुहिन कणों को हरित दूब,
लगती कोमल गादी...
कुहरा छाया संबंधों पर,
रिश्तों की गरमी पर.
हुए कठोर आचरण अपने,
कुहरा है नरमी पर.
बेशरमी नेताओं ने,
पहनी-ओढी-लादी...
नैतिकता की गाय काँपती,
संयम छत टपके.
हार गया श्रम कोशिश कर,
कर बार-बार अबके.
मूल्यों की ठठरी मरघट तक,
ख़ुद ही पहुँचा दी...
भावनाओं को कामनाओं ने,
हरदम ही कुचला.
संयम-पंकज लालसाओं के
पंक-फँसा, फिसला.
अपने घर की अपने हाथों
कर दी बर्बादी...
बसते-बसते उजड़ी बस्ती,
फ़िर-फ़िर बसना है.
बस न रहा ख़ुद पर तो,
परबस 'सलिल' तरसना है.
रसना रस ना ले, लालच ने
लज्जा बिकवा दी...
हर 'मावस पश्चात्
पूर्णिमा लाती उजियारा.
मृतिका दीप काटता तम् की,
युग-युग से कारा.
तिमिर पिया, दीवाली ने
जीवन जय गुंजा दी...
*****
ताज़ा प्रविष्ठियों की सूचना
Categories
- अंगरेजी (1)
- अतीत (1)
- अदब. (1)
- अमरकंटक (1)
- अमरीकी (1)
- आज (1)
- एक ग़ज़ल: मनु बेतखल्लुस (1)
- एक्य (1)
- कुण्डली: टिप्पणी महिमा - सलिल (1)
- क्रन्तिकारी (1)
- ग़ज़ल: मनु बेतखल्लुस (2)
- गीत (1)
- गोंड (1)
- चंद्रशेखाए आजाद (1)
- चिमनी (1)
- चौपाल (1)
- जनतंत्री (1)
- जबलपुर (2)
- जिंदगी (1)
- दशरथ (1)
- दिल्ली (2)
- दीप (1)
- दुश्मन (2)
- देश (1)
- दोहे: आचार्य संजीव 'सलिल' (1)
- नज़र (3)
- नर्मदा (1)
- नवगीत (1)
- नवगीत: आचार्य संजीव 'सलिल' (1)
- निगाह (3)
- नूर (2)
- नेह (1)
- पनघट (1)
- परमात्मा (1)
- पारस मिश्र (1)
- प्यार (1)
- प्रो. दिनेश खरे (1)
- भजन:मिथिला में सजी बरात-स्व. शान्तिदेवी (1)
- भारत (2)
- भावी (1)
- भास्कर (1)
- भील (1)
- भोजन (1)
- भ्रमर (1)
- मंडला (1)
- मदिरा (1)
- मातृ नर्मदे: गोविंदप्रसाद तिवारी 'देव' (1)
- मौत (1)
- राज (1)
- राम (1)
- रौशनी (2)
- लखन (1)
- विन्ध्य. (1)
- शंकर (1)
- शत्रुघ्न (1)
- शहडोल (1)
- शहीद (1)
- शिव (1)
- शोक गीत (1)
- शोर (1)
- शोले (1)
- संजीव 'सलिल' (2)
- सलिल (1)
- सलिल २७ जून (1)
- सलिल २८ जून (1)
- सवाल (2)
- साजन (1)
- साधना (1)
- सिन्दूर (1)
- हँसिया (1)
- acharya sanjiv 'salil. (1)
- acharya sanjiv 'salil' (6)
- acharya sanjiv verma 'salil' (13)
- anugeet chhand (1)
- chhand (11)
- contemporary hindi poetry (3)
- diwali (1)
- doha (3)
- dwipadee (1)
- father's day (1)
- geet (4)
- geeta chhand (1)
- geetika chhand (1)
- hindi chand (1)
- hindi chhand (1)
- jabalpur. (1)
- jhulna chhand (1)
- kamroop chhand (1)
- lakshami (1)
- mdnag chhand (1)
- nav varsh (1)
- navgeet (4)
- naya saal (1)
- new year (1)
- pitra divas (1)
- pro. satya sahay shrivastav (1)
- saman chhand (1)
- samyik hindi kavita (6)
- sanjiv 'salil' (1)
- sawai chhand (1)
- shankar chhand (1)
- shriddhanjali (1)
- shuddhga chhand (1)
- smriti geet (1)
- stotra (1)
- tribhangi chhand (1)
- vidhata chhand (1)
- vishnupad chhand (1)
Blog Archive
नव गीत :
संजीव 'सलिल'
चलो भूत से
मिलकर आएँ...
*
कल से कल के
बीच आज है.
शीश चढा, पग
गिरा ताज है.
कल का गढ़
है आज खंडहर.
जड़ जीवन ज्यों
भूतों का घर.
हो चेतन
घुँघरू खनकाएँ.
चलो भूत से
मिलकर आएँ...
*
जनगण-हित से
बड़ा अहम् था.
पल में माटी
हुआ वहम था.
रहे न राजा,
नौकर-चाकर.
शेष न जादू
या जादूगर.
पत्थर छप रह
कथा सुनाएँ.
चलो भूत से
मिलकर आएँ...
*
जन-रंजन
जब साध्य नहीं था.
तन-रंजन
आराध्य यहीं था.
शासक-शासित में
यदि अंतर.
काल नाश का
पढता मंतर.
सबक भूत का
हम पढ़ पाएँ.
चलो भूत से
मिलकर आएँ...
*
आज की रचना:
नवगीत
संजीव 'सलिल'
फेंक अबीरा,
गाओ कबीरा,
भुज भर भेंटो...
*
भूलो भी तहजीब
विवश हो मुस्काने की.
देख पराया दर्द,
छिपा मुँह हर्षाने की.
घिसे-पिटे
जुमलों का
माया-जाल समेटो.
फेंक अबीरा,
गाओ कबीरा,
भुज भर भेंटो...
*
फुला फेंफड़ा
अट्टहास से
गगन गुंजा दो.
बैर-परायेपन की
बंजर धरा कँपा दो.
निजता का
हर ताना-बाना
तोड़-लपेटो.
फेंक अबीरा,
गाओ कबीरा,
भुज भर भेंटो...
*
बैठ चौंतरे पर
गाओ कजरी
दे ताली.
कोई पडोसन भौजी हो,
कोई हो साली.
फूहड़ दूरदर्शनी रिश्ते
'सलिल' न फेंटो. .
फेंक अबीरा,
गाओ कबीरा,
भुज भर भेंटो...
*
Acharya Sanjiv Salil
http://divyanarmada.blogspot.com
लेबल: geet, navgeet, sanjiv 'salil'
*********************************
गीतिका
तुम
आचार्य संजीव 'सलिल'
सारी रात जगाते हो तुम.
नज़र न फिर भी आते हो तुम.
थक कर आँखें बंद करुँ तो-
सपनों में मिल जाते हो तुम.
पहले मुझ से आँख चुराते,
फिर क्यों आँख मिलाते हो तुम?
रूठ मौन हो कभी छिप रहे,
कभी गीत नव गाते हो तुम
'सलिल' बांह में कभी लजाते,
कभी दूर हो जाते हो तुम.
नटवर नटनागर छलिया से,
नचते नाच नचाते हो तुम
****************************
शोक गीत:
-आचार्य संजीव 'सलिल'
(प्रसिद्ध कवि-कथाकार-प्रकाशक, स्व. डॉ. (प्रो.) दिनेश खरे, विभागाध्यक्ष सिविल इंजीनियरिंग, शासकीय इंजीनियरिंग महाविद्यालय जबलपुर, सचिव इंडियन जियोटेक्नीकल सोसायटी जबलपुर चैप्टर के असामयिक निधन पर )
नर नहीं,
नर-रत्न थे तुम,
समय कीमत
कर न पाया...
***
विरल थी
प्रतिभा तुम्हारी.
ज्ञान के थे
तुम पुजारी.
समस्याएँ
बूझते थे.
रूढियों से
जूझते थे.
देव ने
क्षमताएँ अनुपम
देख क्या
असमय बुलाया?...
***
नाथ थे तुम
'निशा' के पर
शशि नहीं,
'दिनेश' भास्वर.
कोशिशों में
गूँजता था
लग्न-निष्ठा
वेणु का स्वर.
यांत्रिकी-साहित्य-सेवा
दिग्-दिगन्तों
यश कमाया...
***
''शीघ्र आऊंगा''
गए-कह.
कहो तो,
हो तुम कहाँ रह?
तुम्हारे बिन
ह्रदय रोता
नयन से
आँसू रहे बह.
दूर 'अतिमा' से हुए-
'कौसुन्न' को भी
है भुलाया...
***
प्राण थे
'दिनमान' के तुम.
'विनय' के
अभिमान थे तुम.
'सुशीला' की
मृदुल ममता,
स्वप्न थे
अरमान थे तुम.
दिखाए-
सपने सलोने
कहाँ जाकर,
क्यों भुलाया?...
***
सीख कुछ
तुमसे सकें हम.
बाँट पायें ख़ुशी,
सह गम.
ज्ञान दें,
नव पीढियों को.
शान दें
कुछ सीढियों को.
देव से
जो जन्म पाया,
दीप बन
सार्थक बनाया.
***
नर नहीं,
नर-रत्न थे तुम,
'सलिल' कीमत
कर न पाया...
***
अमर शहीद चन्द्र शेखर आजाद जयंती पर विशेष रचना
आचार्य संजीव 'सलिल'
तुम
गुलाम देश में
आजाद हो जिए
और हम
आजाद देश में
गुलाम हैं....
तुम निडर थे
हम डरे हैं,
अपने भाई से.
समर्पित तुम,
दूर हैं हम
अपनी माई से.
साल भर
भूले तुम्हें पर
एक दिन 'सलिल'
सर झुकाए बन गए
विनत सलाम हैं...
तुम वचन औ'
कर्म को कर
एक थे जिए.
हमने घूँट
जन्म से ही
भेद के पिए.
बात या
बेबात भी
आपस में
नित लड़े.
एकता?
माँ की कसम
हमको हराम है...
तुम
गुलाम देश में
आजाद हो जिए
और हम
आजाद देश में
गुलाम हैं....
***************
लेबल: एक्य, क्रन्तिकारी, चंद्रशेखाए आजाद, देश, भारत, शहीद, सलिल
नवगीत
आचार्य संजीव 'सलिल'
हवा में ठंडक
बहुत है...
काँपता है
गात सारा
ठिठुरता
सूरज बिचारा.
ओस-पाला
नाचते हैं-
हौसलों को
आँकते हैं.
युवा में खुंदक
बहुत है...
गर्मजोशी
चुक न पाए,
पग उठा जो
रुक न पाए.
शेष चिंगारी
अभी भी-
ज्वलित अग्यारी
अभी भी.
दुआ दुःख-भंजक
बहुत है...
हवा
बर्फीली-विषैली,
नफरतों के
साथ फैली.
भेद मत के
सह सकें हँस-
एक मन हो
रह सकें हँस.
स्नेह सुख-वर्धक
बहुत है...
चिमनियों का
धुँआ गंदा
सियासत है
स्वार्थ-फंदा.
उठो! जन-गण
को जगाएँ-
सृजन की
डफली बजाएँ.
चुनौती घातक
बहुत है...
नियामक हम
आत्म के हों,
उपासक
परमात्म के हों.
तिमिर में
भास्कर प्रखर हों-
मौन में
वाणी मुखर हों.
साधना ऊष्मक
बहुत है...
divyanarmada.blogspot.com
divynarmada@gmail.com
